आखिर आज वो दिन आ ही गया जब हमारे समूह ने भी पर्वत पर चढ़ाई करने की तैयारी शुरू कर दी। सभी के सभी पूरे जोश के साथ तैयार थे। आखिर एक साल मेहनत जो कि थी चढ़ाई करने की। पूरे जोश और होश के साथ ने चढ़ाई करनी शुरू कर दी। धीरे-धीरे हमने चढ़ाई करनी शुरू कर दी। कई दिन बीत गए सभी का जोश ठंडा पड़ चुका था लेकिन कोई भी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं था। हो भी क्यों कितना कुछ बर्दाश्त जो किया था इस दिन को पाने के लिए।

खैर छोड़िये आगे की कहानी सुनिए, कुछ और दिन बीत गए अब तो हालत खराब हो चुकी थी समुहदल के कुछ लोगो ने। कुछ ने तो हार मान ली, ओर उनमे से दो लोगो चढ़ाई बीच में ही छोड़कर वापिस नीचे चले गए। अब हम दस लोग ही रहते थे समूह में। दो दिन बाद अचानक बर्फीले तुफान ने हमे घेर लिया। तूफान की वजह से सभी के सभी डर गए। सभी को अपनी जिंदगी प्यारी थी, मुझे भी। अब तो सब के सब चढ़ाई को बीच में छोड़कर जाने को तैयार थे। क्योंकि तूफान का पता नहीं कब हमे उड़ाकर ले जाये।

सभी ने सलाह-मशवरा करके चढ़ाई को बीच में ही रोकने की ठानी। लेकिन में पीछे हटने को तैयार नहीं था। सभी ने कहा पागल हो गए हो तुम तूफान तो देखो तुम एक दिन भी जिंदा नहीं रह पाओगे इसलिए चलो हमारे साथ वापिस। लेकिन मेरे जमीर ने मुझे पीछे हटने से मना कर दिया और में बढ़ता रहा, चढ़ता रहा, आगे बढ़ता रहा। कुछ देर बाद पीछे मुड़कर देखा तो मेरे पीछे समूह का एक व्यक्ति ओर चल रहा था। जब मैंने पूछा तुम क्यों नहीं गए तो उसने जवाब दिया मैंने दो बार ओर चढ़ाई शुरू की थी और बीच में छोड़कर भाग गया था लेकिन आज नहीं भागूँगा। उसने मेरी हिम्मत को कई गुना बढ़ा दिया।

हम साथ-साथ चलते गए और एक दिन ऐसा आया कि हमने जीत लिया अपने डर को, हम दोनों पर्वतरोही बनकर वापिस आये। सभी हमारी राह देख रहे थे। शायद उन्हें हमारे आने की उतनी खुशी नहीं थी। जितना अपनी हार की थी क्योंकि वो तो बीच में ही छोड़कर वापिस आ चुके थे। उनको पछतावा हो रहा था वापिस मुड़ जाने का क्योंकि हम जीत गए वो हार गए। ज्यादातर लोग अपने मंज़िल के नज़दीक पहुँचकर हिम्मत छोड़ देते है। लेकिन उस समय बस थोड़ी सी हिम्मत हमारी जिंदगी को बदलने के लिए काफी है। रास्ते की बीच में छोड़कर आना है तो शुरू ही मत करो काम को। अरे यार, बस यह सोचकर प्रयास करते रहो की मंज़िल पास ही है और मैंने खुद से जो वादा किया था उसे पूरा करना है। क्या ये दर्द पूरे साल जो मेहनत की उस दर्द से ज्यादा है क्या। जिस दिन अपने आप को ही सफलता मानना शुरू कर दोगे तो जीत जाओगे। फिर असफलता से कैसा डर।